গদ্য যখন লেখেন এক একটা প্যারাগ্রাফে অনেকগুলো জানলা এক সঙ্গে খুলে দেন। কোনো জানলা মনের দিকে, কোনো জানলা সমাজের দিকে, কোনো জানলা হয় তো উদাসীন মহাকালের দিকে, যে শুধুই সাক্ষী।
কবিতা যখন লেখেন এক একটা শব্দের সঙ্গে জীবনের এক একটা সহজ সরল অনুভব পালকের মত উড়ে এসে বসে।
আজ চলে গেলেন। ওঁর শূন্যতা তো পূর্ণ হওয়ার নয়। সেই মর্যাদাটাই সব চাইতে বড় মর্যাদা যে কোনো মহানুভবের - এ জীবনদায়ী শূন্যতা।
যদি ভাবি কোন সত্যটাকে ওঁর লেখায় বারবার খুঁজে পেয়েছি। সেটা হল আনন্দকে। প্রাণের একটা সহজ আনন্দ আছে। সে সুখের জন্য কাঙাল নয়, আবার দুঃখের হতোদ্যম নয়। সে আনন্দটুকুই বেঁচে থাকার স্বাভাবিক সম্বল। তাকে ছেড়ে যা কিছু তা বিকার। এ সত্যটা ওঁর জীবনদর্শনে বারবার প্রতিফলিত হয়েছে।
আমার আন্তরিক শ্রদ্ধা ও প্রণাম এ মহান স্রষ্টার উদ্দেশ্যে।
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कितना बहुत है
परंतु अतिरिक्त एक भी नहीं
एक पेड़ में कितनी सारी पत्तियाँ
अतिरिक्त एक पत्ती नहीं
एक कोंपल नहीं अतिरिक्त
एक नक्षत्र अनगिन होने के बाद।
अतिरिक्त नहीं है गंगा अकेली एक होने के बाद—
न उसका एक कलश गंगाजल,
बाढ़ से भरी एक ब्रह्मपुत्र
न उसका एक अंजुलि जल
और इतना सारा एक आकाश
न उसकी एक छोटी अंतहीन झलक।
कितनी कमी है
तुम ही नहीं हो केवल बंधु
सब ही
परंतु अतिरिक्त एक बंधु नहीं।